Monday, September 3, 2007

म्यार मुलुक मनख्यूं का अकाल


रीति इगास (खाली इगास)

फीकि बग्वाल (फीकी दीवाली)

हर्चे
रंग (खोए रंग)

छुटे अंग्वाल
(छूटे हाथ)

कैकि खुद (किसी की याद)


कैकि जग्वाल (किसी का इंतजार)

म्यार मुलुक
(मेरे मुल्क)

मनख्यूं का अकाल
(मनुष्यों का अकाल)


गिरीश सुंदरियाल

5 comments:

Pooran Chandra Dabral said...

भाँ जी, आपके लिखे हुए शब्द पढॆ तो लगा मैं गाँव पहुच गया और सारा बच्पन याद आ गया । आपका प्रयतन सराहनीय है ।
पूरन चन्द्र डबराल
pcdabral@gmail.com

Mired Mirage said...

चित्र ने मन मोह लिया ,हालांकि भाषा सिवाय कैकी, फीकी व रीती के नहीं समझ आई ।
घुघूती बासूती

Shrish said...

भेजी 'इगास' माने क्या वंदू?

Home Theater said...

Hello. This post is likeable, and your blog is very interesting, congratulations :-). I will add in my blogroll =). If possible gives a last there on my blog, it is about the Home Theater, I hope you enjoy. The address is http://home-theater-brasil.blogspot.com. A hug.

vijay gaur/विजय गौड़ said...

तेरी खुद, तेरी जग्वाल। कख छै तू गिरीश सुंदरियाल। ब्लाग में देखकर अच्छा लगा।